91.
Paheliyan
पीली तरल, उगलती गैस, चली दिवानी अपने देश। संग मुसाफिर को लेकर जाती, अपनी मंजिल पर पहुंचाती।
उत्तर –गाड़ी
जंगल मेरी जन्मभूमि है, महफिल मेरा धाम। सबके ओंठ लग कर देती, सरगम का पैगाम।
उत्तर – बांसुरी
मैं गहरी छाया का राजा, बेकार होती लकड़ी ताजा, कुल तीन अक्षर का नाम आता, प्रथम कटे बराबर कहलाता।
उत्तर – शीशम
दो अक्षर का मेरा नाम कहलावे, कच्ची कली मसाला के काम आये, दक्षिण भारत में इसका निवास, औषधीय वृक्ष है यह खास।
उत्तर – लौंग
पांव नहीं पर चलता हूं, देता नहीं दिखाई। जब जब मैंने वेग बढ़ाया, मच गई चारों ओर तबाही।
उत्तर – तूफान
एक पैर का काला मेंढक, वर्षा ऋतु में आता है। खूब बरसता है जब पानी, उपयोगी बन जाता है।
उत्तर –छाता
साढ़े तीन अक्षर का नाम आता, कल्पना से मेरा गहरा नाता, वृक्षों में वृक्ष कहां जाता, श्री कृष्ण अर्जुन को बतलाता।
उत्तर –कल्प
एक पुरुष हाय सुंदर मूरत, जो देखे वो उसी की सूरत, फिक्र पहेली पायी ना, बूझन लगा आयी ना।
उत्तर – शीशा
मारे से वो जी उठे, बिन मारे मर जाए, बोलो जरा उसका नाम तो, मजा मुझे आए।
उत्तर –परछाई
हाल-चाल यदि पूछो उससे, नहीं करेगा बात। सीधा-सादा लगता है। पर पेट में रखता दांत।
उत्तर –अनार
हर घर में मैं पाया जाता, चकले का हूं साथी, मुझे चला कर सारी दुनिया, अपना भोजन पाती।
उत्तर – बेलन
कागज पर मैं सरपट भागूं, चल कर थोड़ा सा गिर जाऊं, गर्दन जरा काट दो मेरी, तो उठ कर फिर दौड़ लगाऊं।
उत्तर –पेंसिल
कांटेदार खाल के भीतर, रसगुल्ला है प्यारा, छोटे बड़े प्रेम से खाते, सभी फलों में न्यारा।
उत्तर –लीची