91.
Paheliyan
रोज शाम को आती हूं मैं, रोज सवेरे जाती हूं, नींद न मुझको कभी समझना, यद्यपि आपको सुलाती हूं।
उत्तर - रात
बीन लेकर चलता हूं, पर नहीं मैं सपेरा, दूर दूर की चीज दिखाऊं, नाम बताओ मेरा?
उत्तर – दूरबीन
तीन अक्षर का मेरा नाम, खाने के आता हूँ काम, मध्य कटे हवा हो जाता, अंत कटे तो हल कहलाता। बताओ बताओ मैं कौन हूँ?
उत्तर - हलवा
ऊपर से कुछ हरा पीला, अंदर से है भरा भरा, छिलका दूर हटा लो जी, बीज नहीं है खा लो जी।
उत्तर – केला
मेरे पास शहर हैं,लेकिन घर नहीं। मेरे पास जंगल हैं,लेकिन पेड़ नहीं। मेरे पास पानी है, लेकिन मछलियाँ नहीं। मैं क्या हूँ?
उत्तर: नक्शा
खाना कभी नहीं खाता वह, और न पीता पानी, उसकी बुद्धि के आगे तो, हार माने ज्ञानी।
उत्तर – कंप्यूटर
ठेंगा सब दिखलाएं मुझको, फिऱ भी नहीं गुस्साता हूं, कई लोगों के जेब में रहता, दोस्ती रिश्तों को बढ़ाता हूं।
उत्तर- मोबाइल
एक नारी के बारह बेटे, पोते हैं कुल साठ, हर पोते के साठ है बेटे, नारी बिल्कुल काठ।
उत्तर - टेप
मध्य कटे तो बनता कम, अंत कटे तो कल | लेखन में आती काम, सोचो तो क्या मेरा नाम |
उत्तर – कलम
सदा ही मैं चलती रहती, फिर भी कभी नहीं मैं थकती, जिसने मुझसे किया मुकाबला, उसका ही कर दिया तबादला, बताओ तो मैं हूं कौन ?
उत्तर – घडी
टोपी है हरी मेरी, लाल है दुशाला | पेट में अजीब लगी, दानों की माला |
उत्तर – मिर्च
मैं हूं फांसी का फंदा, मुझसे लगती फांसी नहीं, मगर तुम भी कहलाओगे "साहब", मुझे गले में कसो अगर।
उत्तर- टाई